podcastमहाभारत के संजय के पास थी वह दिव्यदृष्टि कि धृतराष्ट्र के कक्ष में बैठे-बैठे उन्होंने युद्ध का पूरा हाल सुनाया. आज के दौर में हम सब भी धृतराष्ट्र हो चुके लगते हैं. कई चीजें आंखों के सामने से गुजर जाती हैं लेकिन हम उसका मर्म पकड़ नहीं पाते. शुक्र है कि इस वक्त में भी हमारे पास हमारे अपने संजय हैं. संजय, जो हमें ऐसे मर्म खोज-खोजकर दिखलाते चलते हैं. यह संजय, खरा सोना हैं. नाम भी है संजय कुंदन.

इनकी कविताओं में मानवीय उष्मा मिलेगी, जीवन की स्निग्ध धारा मिलेगी, और अपने आप से बहस करता हुआ एक शख्स मिलेगा. संजय कुंदन के बारे में मैं कुछ कहूं, इससे बेहतर उनके बारे में संजय की कविताएं कहेंगी.

पेश है आज संजय कुंदन की कुछ रचनाएं.

पहली कविता का शीर्षक है- दिल्लीमैं दिल्ली से क्यों नाराज होऊं
मेरा दांव पर लगा ही क्या है
जो मैं हार जाऊंगा
और मैं ऐसा क्या लेकर आया
जो लूट लिया जाऊंगा
निचोड़ लिया जाऊंगा

यही क्या कम है कि
मैं यहां उन लोगों के बीच हूं जो
मुझसे भी ज्यादा खरोंचें लिए आए यहां
दिल्ली हमलोगों के लिए रात की आखिरी बस थी
जिसके पीछे दौड़े हम पूरी ताकत के साथ
और सवार हो गए किसी तरह
भीड़ में कुचले जाने
और बाहर फेंक दिए जाने का जोखिम उठाकर
इस बस के छूट जाने का मतलब था
जिंदगी के अंधेरे बियाबान में खो जाना
पर इस बात की खुशी भी क्यों मनाएं
कि हम चले आए दिल्ली
बहुत से लोग तो नहीं आ पाए।
अक्सर हमसे कहा जाता है कि
आप जिसे दिल्ली समझ रहे हो
वह दिल्ली तो है नहीं
पर इसका क्या रोना,
हम कोई दिल्ली आने के लिए
तो दिल्ली आए नहीं
और जो दिल्ली आने के लिए
दिल्ली आए
वही कौन सा पहुंच गए दिल्ली.

दूसरी कविता का शीर्षक है- गऊ जैसी लड़कियां

अब भी कुछ लड़कियां
गऊ जैसी होती हैं

हर बात में हां कहने वाली
मौन रहकर सब कुछ सह लेने वाली
किसी भी खूंटे से चुपचाप बंध जाने वाली

हमारी संस्कृति में
सुशील और संस्कारी कन्याओं के
यही सब गुण बताए गए हैं

गऊ जैसी लड़कियों के मां-बाप
गर्व से बताते थे
कि उनकी बेटी गऊ जैसी है

वे निश्चिंत रहते थे
कि उनकी नाक हमेशा
ऊंची रहेगी
क्योंकि उनकी बेटी गऊ जैसी है

वे गऊ जैसी लड़कियां
इतनी सीधी थीं कि
समझ नहीं पाती थीं कि
उनके घर के ठीक बगल का
एक इज्जतदार आदमी
जिसे वह रोज प्रणाम करती हैं
असल में एक शिकारी हैं
वे तो यह भी नहीं भांप पाती थीं
कि अपने पति की नजर में वे दुधारू नहीं हैं
उनकी दुनिया इतनी छोटी थी
कि उन्हें यह भी नहीं पता होता था
कि गायों की रक्षा के लिए
गली-गली में बन रही हैं सेनाएं

जब उनमें से किसी के चेहरे पर
तेजाब फेंका जाता
या किसी पर किरासन तेल उड़ेला जाता
या किसी के कपड़े फाड़े जाते
तब वह गाय की तरह ही रंभाती थी
बस थोड़ी देर के लिए

गौरक्षकों तक नहीं पहुंच पाती थी उसकी आवाज.

तीसरी कविता का शीर्षक है- कहावतें

कितना हँसोड़ रहा होगा वह आदमी
जिसने एक ऊँट के साथ
मजाक किया होगा
उसके मुँह में जीरे का एक दाना रखकर

सचमुच बड़ा फक्कड़ रहा होगा वह
बड़ा ही मस्तमौला
जिसने छछूंदर के सिर पर
चमेली के तेल मले जाने की
मजेदार बात सोची होगी

जरा कहावतों के जन्म के बारे में सोचो

किसने कहा होगा पहली बार
कि अधजल गगरी छलकत जाए
आए थे हरिभजन को
ओटन लगे कपास

वे हमारे पूर्वज थे
जिन्हें कवि नहीं बनना था
नहीं होना था उन्हें प्रसिद्ध
इसलिए कहावतों में उन्होंने
अपना नाम नहीं जोड़ा

वे जिंदगी के कटु आलोचक रहे होंगे
गुलमोहर की लाल हंसी हंसने वाले
समय को गेंद की तरह उछालने वाले
अपनी नींद और अपने आराम के बारे में
खुद फैसले लेने वाले
यारबाश लोग रहे होंगे वे
उनमें से कोई तेज-तर्रार भड़भूंजा रहा होगा
जिसने पहली बार महसूस किया होगा कि
अकेला चना भाँड़ नहीं फोड़ता
कोई उत्साही मल्लाह रहा होगा
जिसने निष्कर्ष निकाला-
जिन खोजा तिन पाइयां गहरे पानी पैठ

क्य तुम उन अनाम पूर्वजों के
साहस की तपिश
महसूस कर सकते हो

जरा सोचो
उस दिन क्या हुआ होगा
जब उन्हीं में से किसी ने
एक ढोंगी की ओर उँगली उठाकर
कहा होगा-मुँह में राम बगल में छुरी

उन अनाम पूर्वजों ने
डरना तो शायद
सीखा ही नहीं होगा

जब मौत भी उनके सिरहाने
आ खड़ी होती होगी
तो वे उसे चिढ़ाते होंगे
रँगासियार कहकर

अब नहीं दिखते
वैसे मस्तमौला, फक्कड़ और साहसी लोग
नहीं रहे जिंदगी के कटु आलोचक
और इसीलिए दम तोड़ रही है कहावतें

तुम्हें अपनी भाषा की
कितनी कहावतें याद हैं
यह समझदार लोगों का दौर है
यह चालाक कवियों का दौर है
यह प्रायोजित शब्दों का दौर है

काश इस दौर के बारे में
मैं एक सटीक कहावत कह पाता.

आप सुन रहे थे आज संजय कुंदन की कविताएं. अगली दफे फिर हम मिलेंगे, किसी और रचनाकार के साथ. तब तक के लिए पूजा प्रसाद को दें इजाजत. नमस्कार.





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