आप लगातार सुन रहे हैं कि भारत में कोविड-19 से बड़ी राहत मिल रही है क्योंकि नंबर (Covid-19 Numbers Explained) कम हो रहे हैं, लेकिन नवंबर तक हर एक कन्फर्म केस पर देश में औसतन करीब 90 केस पता ही नहीं चलने (Undetected Cases) का आंकड़ा क्या कहता है? ये आंकड़ा सितंबर में 60 से 65 केस तक का था. एक तरफ, दिल्ली (Delhi) और केरल में हर संक्रमण पर करीब 25 केस नहीं पहचाने गए तो उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) और बिहार में यह नंबर करीब 300 तक रहा. इन आंकड़ों को कैसे समझा जाए और इनसे किस नतीजे पर पहुंचा जाए.

विज्ञान और तकनीक विभाग के उसी पैनल ने ये नंबर बताए हैं जिसने भारत के लिए खास सुपरमाॅडल बनाकर अनुमान दिया था कि फरवरी 2021 में भारत से महामारी खत्म हो जाएगी. इस पैनल ने राज्यवार आंकड़े बताते हुए यह भी कहा कि ज़्यादातर राज्यों में 70 से लेकर 120 केस हर कन्फर्म केस के मुकाबले नहीं पहचाने गए. आइए इन आंकड़ों का पूरा खेल समझते हैं.

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क्या कह रहे हैं आंकड़ेइस पैनल के हवाले से ताज़ा खबरें कह रहीह हैं कि करीब 90 केस न पहचानने के भारत के आंकड़े को आप ऐसे समझ सकते हैं कि हर कन्फर्म केस पर न पहचाने गए केसों की संख्या यूके और इटली जैसे देशों में महज़ 10 से 15 रही. वहीं, दिल्ली में दूसरे पीक के दौरान 43 केस मिस हुए जबकि तीसरे पीक के दौरान 21 क्योंकि इस वक्त तक दिल्ली सरकार ने टेस्टिंग ज़्यादा करने की कवायद कर ली थी.

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हैदराबाद आईआईटी समेत वेल्लूर, कोलकाता, बेंगलूरु आदि के विज्ञान संस्थानों के विशेषज्ञ इस पैनल में शामिल रहे, जिनके विश्लेषण को मेडिकल रिसर्च के जर्नल में प्रकाशित भी किया गया.

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जानकारों के मुताबिक भारत में हर्ड इम्यूनिटी के स्पष्ट संकेत मिले.

अब क्या है भविष्यवाणी?
इस पैनल ने अपने सुपरमाॅउल के मुताबिक यह अनुमान दिया है कि फरवरी 2021 तक भारत से महामारी लगभग खत्म हो जाएगी. भारत में इसके बाद और कोई पीक या संक्रमण की लहर नहीं आएगी और फरवरी 2021 में तकरीबन 20 हज़ार एक्टिव केस ही रह जाएंगे. इसका कारण बताया गया है कि जिन केसों की पहचान ही नहीं हो सकी, वो बहुत बढ़ चुके हैं.

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पैनल के मुताबिक भारत की 60 फीसदी आबादी या तो संक्रमित हो चुकी है या फिर इम्यूनिटी विकसित कर चुकी है. विश्लेषण में कहा गया है कि 60 फीसदी आबादी में एंटीबाॅडी हैं. इस अनुमान का आधार यह है कि त्योहरों के मौसम के बावजूद कई राज्यों में संक्रमण में उछाल नहीं दिखा. दिल्ली में ज़रूर दिखा और उत्तराखंड व मेघालय में भी फिलहाल केस बढ़ते दिखे हैं.

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कैसे नाकाबिलियत बन गई वरदान?
इन आंकड़ों के मद्देनज़र कहा जा रहा है कि भारत में अगर और पीक नहीं आएगी तो यह अनोखा होगा. कई देशों में कई पीक देखी गई हैं. यूके में एक और पीक चल रही है तो जर्मनी और स्वीडन को हर्ड इम्यूनिटी के बावजूद दूसरी बार लाॅकडाउन लगाना पड़ा है. इधर, भारत में सिर्फ सितंबर में ही एक पीक देखी गई और उसके बाद से लगातार संक्रमण कम दिख रहे हैं.

इस बारे में पैनल के अधिकारियों से बातचीत के हवाले से द प्रिंट ने लिखा है कि भारत की जो अक्षमताएं रहीं, उनसे काफी मदद मिली. मिसाल के तौर पर, जर्मनी में सख्त लाॅकडाउन रहा तो लोग घर से बाहर नहीं निकले, लेकिन भारत में करीब एक महीने के सख्त लाॅकडाउन के बाद सब ढीला पड़ गया. लोग न केवल बाहर निकले बल्कि मास्क पहनने तक से गुरेज़ किया गया.

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इसका सीधा मतलब यह है कि जर्मनी जैसे देशों में जहां बड़ी आबादी अब भी संक्रमित नहीं है, वहीं भारत में ज़्यादातर लोग संक्रमित हो चुके हैं, भले ही केस पहचाने न गए हों. दूसरे कारण ये भी रहे कि दक्षिण एशिया और अफ्रीका में वायरस का असर तुलनात्मक रूप से कम रहा. संभव है कि यहां युवा आबादी ज़्यादा होना बड़ी वजह रही हो. कुल मिलाकर जानकारों की मानें तो देश में हर्ड इम्यूनिटी के संकेत साफ हैं और फरवरी तक संक्रमण पूरी तरह काबू में हो सकता है.





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