रवीन्द्रनाथ टैगोर ‘ठाकुर’ जन्मदिन विशेष (Rabindranath Tagore Birthday): आज महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ‘ठाकुर’ का जन्मदिन है. रवीन्द्रनाथ टैगोर ‘ठाकुर’ विश्वविख्यात कवि, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के एकमात्र नोबल पुरस्कार विजेता हैं. अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नए प्राण फूंके. गुरुदेव की दो रचनाएं राष्ट्रगान बनीं. भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान इन्हीं की रचनाएं हैं. इस शुभ मौके पर हम आपके लिए कविता कोश के सभार से लाए हैं रवीन्द्रनाथ टैगोर ‘ठाकुर’ की कालजयी रचनाएं…

हो चित्त जहां भय-शून्य, माथ हो उन्नत….

हो चित्त जहां भय-शून्य, माथ हो उन्नतहो ज्ञान जहां पर मुक्त, खुला यह जग हो
घर की दीवारें बने न कोई कारा

हो जहां सत्य ही स्रोत सभी शब्दों का
हो लगन ठीक से ही सब कुछ करने की
हों नहीं रूढ़ियां रचती कोई मरुथल
पाये न सूखने इस विवेक की धारा
हो सदा विचारों ,कर्मों की गतो फलती
बातें हों सारी सोची और विचारी

हे पिता मुक्त वह स्वर्ग रचाओ हममें
बस उसी स्वर्ग में जागे देश हमारा.

प्रयाग शुक्ल द्वारा बांग्ला से अनूदित गीतांजलि में से

करता जो प्रीत…
दिन पर दिन चले गए,पथ के किनारे
गीतों पर गीत,अरे, रहता पसारे ..
बीतती नहीं बेला, सुर मैं उठाता .
जोड़-जोड़ सपनों से उनको मैं गाता ..
दिन पर दिन जाते मैं बैठा एकाकी .
जोह रहा बाट, अभी मिलना तो बाकी ..
चाहो क्या,रुकूँ नहीं, रहूँ सदा गाता .
करता जो प्रीत, अरे, व्यथा वही पाता ..

मूल बांगला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल

आमार शोनार बांग्ला …

आमार शोनार बांग्ला
आमार शोनार बांग्ला,
आमि तोमाए भालोबाशी.

चिरोदिन तोमार आकाश,
तोमार बताश,
अमार प्राने बजाए बाशी.

ओ मां,
फागुने तोर अमेर बोने
घ्राने पागल कोरे,
मोरी हए, हए रे,
ओ मां,
ओघ्राने तोर भोरा खेते
अमी कि देखेछी मोधुर हाशी.

की शोभा, की छाया गो,
की स्नेहो, की माया गो,
की अचोल बिछाइछो,
बोतेर मूले,
नोदिर कूले कूले!

मां, तोर मुखेर बानी
आमार काने लागे,
शुधार मोतो,
मोरी हए, हए रे,
मां, तोर बोदोनखानी मोलीन होले,
आमि नोयन जोले भाशी.

(हिन्दी अनुवाद):
मेरा प्रिय बंगाल
मेरा सोने जैसा बंगाल,
मैं तुमसे प्यार करता हूँ.

सदैव तुम्हारा आकाश,
तुम्हारी वायु
मेरे प्राणों में बाँसुरी सी बजाती है.

ओ मां,
वसंत में आम्रकुंज से आती सुगंध
मुझे खुशी से पागल करती है,
वाह, क्या आनंद!
ओ मां,
आषाढ़ में पूरी तरह से फूले धान के खेत,
मैने मधुर मुस्कान को फैलते देखा है.

क्या शोभा, क्या छाया,
क्या स्नेह, क्या माया!
क्या आंचल तले
नदी किनारे किनारे!

मां, तेरे मुख की वाणी,
मेरे कानो को,
अमृत लगती है,
वाह, क्या आनंद!
मेरी मां, यदि उदासी तुम्हारे चेहरे पर आती है,
मेरे नयन भी आंसुओं से भर आते हैं.
जब तुम्हारे साथ मेरा खेल हुआ करता था….
मेरा खेल साथ तुम्‍हारे जब होता था
तब, कौन हो तुम, यह किसे पता था.
तब, नहीं था भय, नहीं थी लाज मन में, पर
जीवन अशांत बहता जाता था
तुमने सुबह-सवेरे कितनी ही आवाज लगाई
ऐसे जैसे मैं हूँ सखी तुम्‍हारी
हंसर साथ तुम्‍हारे रही दौड़ती फिरती
उस दिन कितने ही वन-वनांत.

ओहो, उस दिन तुमने गाए जो भी गान
उनका कुछ भी अर्थ किसे पता था.
केवल उनके संग गाते थे मेरे प्राण,
सदा नाचता हृदय अशांत.
हठात् खेल के अंत में आज देखूं कैसी छवि–
स्‍तब्‍ध आकाश, नीरव शशि-रवि,
तुम्‍हारे चरणों में होकर नत-नयन
एकांत खड़ा है भुवन.

जन गण मन अधिनायक जय हे…

जन गण मन अधिनायक जय हे
भारत भाग्य विधाता
पंजाब, सिन्ध, गुजरात, मराठा
द्राविड़, उत्कल, बंग
विन्ध्य, हिमाचल, यमुना, गंगा
उच्छल जलधि तरंग
तव शुभ नामे जागे
तव शुभ आशिष मागे
गाहे तव जय गाथा
जन गण मंगल दायक जय हे
भारत भाग्य विधाता
जय हे, जय हे, जय हे
जय जय जय जय हे.





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