अदीम हाशमी की शायरी (Adeem Hashmi Shayari): अदीम हाशमी का नाम ‘शेर’ और शायरी की दुनिया में बड़े अदब से लिया जाता है. अदीम हाशमी ने अपने शायरी में मोहब्बत की कसक, उलझन और जुदाई को बड़ी खूबसूरती से लफ्जों से पिरोया. अदीम हाशमी पाकिस्तान के लाहौर से ताल्लुक रखते थे. आज हम आपके लिए कविताकोश के साभार से लेकर आए हैं अदीम हाशमी की चुनिंदा शायरी….

1. राहत-ए-जाँ से तो ये दिल का वबाल अच्छा है
उस ने पूछा तो है इतना तेरा हाल अच्छा है

माह अच्छा है बहुत ही न ये साल अच्छा हैफिर भी हर एक से कहता हूँ के हाल अच्छा है

तेरे आने से कोई होश रहे या न रहे
अब तलक तो तेरे बीमार का हाल अच्छा है

ये भी मुमकिन है तेरी बात ही बन जाए कोई
उसे दे दे कोई अच्छी सी मिसाल अच्छा है

दाएँ रुख़्सार पे आतिश की चमक वजह-ए-जमाल
बाएँ रुख़्सार की आग़ोश में ख़ाल अच्छा है

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आओ फिर दिल के समंदर की तरफ़ लौट चलें
वही पानी वही मछली वही जाल अच्छा है

कोई दीनार न दिरहम न रियाल अच्छा है
जो ज़रूरत में हो मौजूद वो माल अच्छा है

क्यूँ परखते हो सवालों से जवाबों को ‘अदीम’
होंट अच्छे हों तो समझो के सवाल अच्छा है.

2. तमाम उम्र की तनहाई की सज़ा दे कर
तड़प उठा मेरा मुंसिफ़ भी फ़ैसला दे कर

मैं अब मरूँ के जियूँ मुझ को ये ख़ुशी है बहुत
उसे सुकूँ तो मिला मुझ को बद-दुआ दे कर

मैं उस के वास्ते सूरज तलाश करता हूँ
जो सो गया मेरी आँखों को रत-जगा दे कर

वो रात रात का मेहमाँ तो उम्र भर के लिए
चला गया मुझे यादों का सिलसिला दे कर

जो वा किया भी दरीचा तो आज मौसम ने
पहाड़ ढाँप दिया अब्र की रिदा दे कर

कटी हुई है ज़मीं कोह से समंदर तक
मिला है घाव ये दरिया को रास्ता दे कर

चटख़ चटख़ के जली शाख़ शाख़ जंगल की
बहुत शरार मिला आग को हवा दे कर

फिर इस के बाद पहाड़ उस को ख़ुद पुकारेंगे
तू लौट आ उसे वादी में इक सदा दे कर

सुतून-ए-रेग न ठहरा ‘अदीम’ छत के तले
मैं ढह गया हूँ ख़ुद अपने को आसरा दे कर.





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