अल्पकालिक संबंधो में पसंद-नापसंद  वाजिब है, किन्तु दीर्घकालिक संबंधो में समर्पण और विश्वास ही मुख्य होता है |किसी भी रिश्ते को बनाये रखने के लिए दोनों ओर से समझौता होते रहना आवश्यक होता है |

जब बात पसंद और नापसंद की आती है तो,हम अपने पसंद के व्यक्ति की सभी बुराइयों को नज़रंदाज़ कर देते है |

हम उसके लिए कोई भी समझौता करने को तैयार हो जाते है |

जब हमने समझौता करने की ज़िम्मेदारी उठा रखी है तो फिर दूसरेके द्वारा समझौता किये जाने की शर्त  हम नहीं रख सकते |

आगे जहाँ  तक हमारी हिम्मत होती है,हम अपने बनाये रिश्ते को समझौता कर-करके बचाते है और जब हिम्मत जवाब देने लगती है 

तब हमें अपने फैसले /समझौते पर अफ़सोस होता है |

मगर दोस्तों तब तक बहुत देर हो चुकी होती है | 

वास्तव में जो आपका साथ दे सकते थे उन्हें तो आप  कब के पीछे छोड़ चुके होते है |

संकट के समय जो आपके पास होता है वास्तव में संकट तो उसी के द्वारा पैदा किया गया होता है |

अब फिर आपके पास जो करने को बचता  है वह  होता है  एक और समझौता |

सार– कोई भी दीर्घकालिक सम्बन्ध  समझौता करके मत  बनाइये | 

सही  फैसला  दिल  और दिमाग दोनों के उपयोग  से ही संभव  होता है |

Vinod Kashyap @admin

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