पांच बातें जो लव मैरिज को असफल करती है

  1. एक जैसे स्वभाव/ योग्यता /कार्य करने वाले
  2. बहुत अधिक भावुक /बैचैन/ आतुरता
  3. धन की कमी/अस्थायी आय स्त्रोत
  4. एकाकी जीवनशैली/आदते / व्यवहार
  5. परिवारवालो की मर्ज़ी के खिलाफ/ज़िद में किया गया
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शादी सिर्फ दो जिस्मो का मिलन नहीं बल्कि दो परिवारों,पुरे समाज और आने वाली पीढ़ी को भी प्रभावित करती है | रिश्तो का टूटना दो व्यक्तियों को बंधन मुक्त कर सकता है लेकिन बच्चो के भविष्य को नर्क बना देता है जो आगे चलकर कुंठा और अपराध को जन्म देते है

1. एक जैसे स्वभाव/ योग्यता /कार्य करने वाले-

एक जैसे स्वभाव के लोगो के बीच जितनी जल्दी दोस्ती/ रिश्ता होता है वह उतनी ही जल्दी टूटने वाला भी होता है. कारण भी चौकाने वाले है –

दोनों जब एक दूसरे  से मिलते है तब दोनों  ही काफी संभलकर अपने आप को अच्छा साबित करते हुए मिलते है

दोनों अपनी कमियों की बात करके एक दूसरे का सहारा बनने की कोशिश करते है,अपने लिए सहानुभूति पैदा करते है  परन्तु वास्तविकता कुछ और होती है.

दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित तो योग्यता/ कार्य/ हिम्मत को देखकर होते है परन्तु मिल जाने के बाद दोनों ही एक दूसरे को अपने से कमज़ोर देखना/ रखना पसंद करते है.

बड़ा विरोधाभास है परन्तु सच यही है कि दो एक जैसे योग्यता/ विचार रखने वाले लोग ज्यादा देर तक एक दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर पाते.बात दोस्ती या साथ घूमने कि हो तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योकि तब दोनों को बहुत अधिक समय तक एक दूसरे के साथ नहीं रहना होता ,परन्तु शादी के बाद दोनों को पूरा समय एक दूसरे के साथ एक ही छत के निचे बिताना होता है. शुरुआत के कुछ दिन तो खातिर से लिहाज़ से /लोग क्या कहेंगे /पसंद हमारी है आदि आदि … जैसे आदर्श बातो को सोचकर दोनों  खुश रहने, तालमेल बिठाने की कोशिश करते है लेकिन जैसे ही किसी एक का भी सब्र टूटता है फिर वह अपनी वास्तविकता में आ जाता है और रिश्ते की परवाह किये बिना अपनी ज़िद / घमंड/ अकड़ को सामने रखकर दूसरे को समझौता करने/ झुकने के लिए बाध्य करने लगते है|

ऐसा करते हुए वे यह भूल जाते है कि दोनों ही एक ही जैसे है, कोई समझौता करना झुकना नहीं चाहेगा, किसी को भी अपनी हार मंज़ूर नहीं होती और यही से रिश्तो में दरार आनी शुरू हो जाती है|

दोनो ही अपने आप मे घुटते रहते है जो झगड़े का रूप लेता है और आगे चलकर अपराध के रूप मे या तलाक के रूप मे इसका दुखद अंत होता है. इस बीच मे अगर कोई बच्चा जन्म ले लेता है तो यह उन दोनो के साथ साथ पूरे मानव समाज और देश के लिए भी संकटपूर्ण हो जाता है.

वास्तव मे गंभीरता से सोचकर देखे तो समझ पाएंगे कि जिसे हम पसंद करते है उसे हमेशा पसंद करते रहेंगे ज़रूरी नहीं होता क्योकि ज़रूरते,पसंद और इच्छाएँ हमेशा बदलते रहती है.

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तो क्या कर सकते है ?

मै तो कहूंगा कि जिसके साथ पूरी ज़िन्दगी बितानी है उसे करीब से जानिए .उसकी कमज़ोरी और योग्यता को मन से स्वीकार कीजिये. क्या आगे उसे अपने से बड़ा बनते आप देख पायेगे? यह सवाल पूरी ईमानदारी के साथ स्वयं से कीजियेगा.

वह कभी आपसे समझौता नहीं करेगा, हमेशा आपकी हाँ मे हाँ नहीं मिलाएगा, हर बार आपका ही पक्ष नहीं लेगा   और आपकी आलोचना करने,सामने टोकने, उलाहना देने से भी नहीं हिचकिचायेगा.

क्या अब भी आपको वह पूरी ज़िन्दगी बिताने के लिए पसंद है?

यदि भीतर से आवाज़ आये कि हाँ , तो ज़रूर आप प्रेम विवाह के बारे मे सोच सकते है ,बस याद रखियेगा यह फैसला आपका अपना है और किसी भी विषम परिस्थिति के लिए किसी और को दोष नहीं दे पायेंगे.

2. बहुत अधिक भावुक /बैचैन/ आतुरता –

किसी  की भी अधिकता उसका मूल्य  घटा देती है| दोनो मे से एक बहुत अधिक भावुक, संवेदनशील है तो यह दूसरे का ख्याल रखने के हिसाब से तो ठीक है परन्तु यह उसकी कमज़ोरी भी होती है| अत्यधिक बेचैनी,अधीरता ,भावुकता हर जगह पर सही नहीं होती.कितने ही स्थानों पर संयम और होश मे रहकर कार्य करने पड़ते है.

एक को यदि दूसरे की अधीरता/ बेचैनी/ भावुकता के कारण बेइज्जत होना पड़ा या कोई मौका हाँथ से निकला तो फिर यह मन मे कड़वाहट पैदा करने वाला होता है. सामने ज़रूर वह कुछ कहे न कहे लेकिन आगे वह किसी बड़े फैसले /कार्य मे दूसरे को साथ नहीं रखना चाहता और इसके लिए उसे झूठ का सहारा लेना पड़ता है|

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कोई भी किसी कमज़ोर को अपने साथ रखकर अपना नुकसान नहीं कराना चाहेगा.

शादी हो जाने जैसी स्थिति मे लोग चाहते न चाहते एक दूसरे को साथ रखने को बाध्य रहते है. यह उनकी मज़बूरी बन जाती है जिसके कारण वे अपना पूरा प्रयास कार्य की सफलता पर नहीं दे पाते और अक्सर असफल होते है जिसका कारण वो अपने साथी को मानते हुए उससे दूरी  बनाने, झूठ बोलने, छुटकारा पाने जैसे प्रयास करने लगते है.

शादी से पहले यह आतुरता,बेचैनी,भावुकता दोनो को आकर्षित करने का, एक दूसरे के ख्याल रखने की गारंटी होती थी मगर अब उलझन बनकर रह जाती है.अक्सर एक व्यक्ति दूसरे के प्रति इतना अधिक आशक्त हो जाता है कि वह दूसरे के लिए साथी कम और बोझ ज्यादा लगाने लग जाता है. ऐसी स्थिति मे भी रिश्तो के टूटने कि बहुत सम्भावना रहती है|

किसी से बहुत अधिक प्रेम हो चाहे नफरत, दुःख ही देती है | अधिक प्रेम सोने के पिंजरे मे कैद जैसा लगता है और नफरत दुश्मनी/अपराध के लिए दुष्प्रेरित करती है|

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3. धन की कमी/ अस्थायी आय स्त्रोत-

शादी के बाद हर दम्पत्ति सुख से जीवन यापन करना चाहते है, और इसके लिए समुचित आय, निर्धारित खर्चो की समय पर पूर्ति, इच्छाओ के लिए समय, आराम के लिए सुविधाएं आदि  अपने सपनो मे सजाये एक दूसरे के जीवन मे प्रवेश करते है नई दुनिया शुरू करते है|अभाव का ख्याल तो कभी किये नहीं होते लेकिन वक्त के साथ परिस्थितियां बदलती है, अभाव से दो चार होना पड़ता है|

दुःख/ संकट से सामना होते ही  सच्चे प्रेम की परीक्षा शुरू हो जाती है|एक से दो होते ही खर्चे भी बढ़ जाते है | स्थायी आय/ नौकरीपेशा वाले तो आर्थिक रूप से सक्षम होते है लेकिन अस्थायी आय वालो को शादी के बाद ज्यादा से ज्यादा समय अपने काम पर देना पड़ता है | समय न दे पाने के कारण, धन की कमी के कारण, दोनो मे मतभेद-झगड़े शुरू हो जाते है| समझदार होते है वे दोनो मिलकर आय को बढ़ाने मे जुटते है लेकिन समयाभाव के कारण दोनो को अफ़सोस रहता है, इस बीच मे किसी ने मन मे चरित्र को लेकर शंका डाल दी तो फिर रिश्ता टूटकर ही रहता है|

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वास्तव मे प्रेम विवाह करने से पहले दोनो को अपनी आर्थिक स्थिति का सही आंकलन कर लेना चाहिए| भावावेश मे उठाया गया कदम वर्तमान परिस्थिति के अनुरूप हो सकता  है लेकिन भविष्य के लिए नुकसान देने वाला हो सकता है | समुचित आय के अभाव मे सुख संसाधनों की व्यवस्था नहीं हो पाती इस कारण इच्छाओ को मन मे दबाये ज़रूरतों की पूर्ति मे लगे रहते है,लेकिन भीतर कही न कही अपने फैसले पर अफ़सोस भी इन्हे रहता है| कहा भी गया है कि “जब गरीबी घर मे दरवाजे से प्रवेश करती है तो अक्सर प्रेम खिड़की से भाग जाता है” |

4. एकाकी जीवनशैली/ आदते / व्यवहार-

प्रेमी जोड़े जितने समय के लिए एक दूसरे से मिलते है उतने कम समय मे दोनो एक दूसरे के व्यवहार/ बुरी आदतों आदि को  सही तरीके से पहचान नहीं पाते. दोनो अपने सर्वोत्तम वेशभूषा मे,मेकअप किये ,परफुयम लगाए, अपने अच्छे व्यवहार और खूबियों के साथ एक दूसरे से मिलते एवं समय बिताते है| यह भी कह सकते है कि एक दूसरे को प्रभावित करने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास करते है ऐसे मे किसी की कमियों/ बुराइयों को जान पाना आसान नहीं होता|

एक समझदार और सुलझे हुए व्यक्ति का भ्रम मन मे पाले शादी के बंधन मे बँधकर जब दोनो साथ मे दिन-रात गुजारना शुरू करते है तब उन्हें अपनी गलती का अहसास होता है | व्यक्ति जब अपने असली स्वरुप मे आता है तब ही अपनी असली आदतों/ व्यवहारों को प्रदर्शित करता है| कोई बहुत साफ सफाई पसंद करता है तो कोई गन्दगी मे रहने को अपनी आदत बनाये हुए होता है| एक को दूसरे की आदत/ व्यवहार से परेशानी हो सकती है परन्तु पसंद अपनी होने के कारण किसी से शिकायत भी नहीं कर सकते और समझौता करके जीने के लिए मज़बूर हो जाते है| यह समझौता धीरे-धीरे चिढ़ के रूप मे सामने आती है और झगड़े का स्वरुप लेकर रिश्ता ख़त्म होने तक की नौबत ला देती है| कुछ लोग एकांत पसंद होते है तो कुछ दोस्तों से घिरे रहते है,दोस्तों के साथ ज्यादा समय बिताना पसंद करते है | कुछ को नशे की आदत होती है जो अब सामने आ जाती है, कुछ को दूसरे की बुराई करते रहना, हर बात मे कमी ढूंढने की आदत होती है, कुछ बेवजह दूसरो से उलझने झगड़ा करने मे अपनी शान समझते है, कुछ को कलह करते रहना पसंद होता है|  ऐसे मे पति-पत्नी के बीच वैचारिक मतभेद उत्त्पन्न होना स्वाभाविक है| प्रेम नाम का चश्मा ऐसा होता है जो अच्छे और बुरे की पहचान भुला देता है| जब तक समझने लायक होते है तब तक गलती हो चुकी होती है जिसे सुधार पाना नामुमकिन होता है|

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क्या करे? यदि किसी मनपसंद के साथ जीवन बिताने का निर्णय कर ही चुके है तो पूरी ईमानदारी के साथ उसकी आदतों/ व्यवहारों को समझने उसे सही तरीके से पहचानने की कोशिश करे| पूर्वाग्रह से ग्रसित हुए बिना अपने लायक को/ अपनी पसंद को अपनाये | एक बार निर्णय कर लेने के बाद समझौता करने, अगले की बुराई को स्वीकार करने, जीवन को अपनी शर्तो पर नहीं दोनो की रज़ामंदी से जीने का संकल्प लीजिये तब ही अच्छे जीवनसाथी बनकर जीवन बिता पाएँगे|

5. परिवारवालो की मर्ज़ी के खिलाफ/ ज़िद में किया गया-

प्रेम विवाह के लिए अक्सर अपने घरवालों से बगावत करनी पड़ जाती है, ऐसे मे विवाह के उपरांत दोनो के घरवालों /सम्बन्धियों से किसी तरह के मदद की उम्मीद नहीं की जा सकती| पति-पत्नी दोनो को ही एक दूसरे का दुःख -सुख सुनना और समझना पड़ता है| किसी एक की भी नासमझी या अकड़ दूसरे को अकेला कर सकता है|समझदारी के अभाव मे दोनो का जीवन नर्क बन सकता है| जब विवाह का फैसला लेते समय घरवालों की सलाह नहीं लेते तो समस्या आने/ ज़रूरत पड़ने पर उनसे किसी प्रकार की उम्मीद कैसे कर सकते है| दो परिवारों की रज़ामंदी से बने रिश्ते को बनाये रखने मे दोनो परिवार अपना सब कुछ झोंक देते है, किसी भी प्रकार की समस्या को सभी मिलकर सुलझाते है, रिश्ते बचाये रखने मे सहयोग करते है|

मै अरेंज मैरिज की तरफदारी नहीं कर रहा हूँ और ना ही प्रेम विवाह को ही बढ़ावा देने का मेरा कोई इरादा है| बिना सामंजस्य के किसी भी तरह का रिश्ता हो, लम्बे समय तक नहीं चल सकता|

आइये एक बार फिर से कुछ बातो को दोहरा लेते है-

1. जिससे शादी करना चाहते है उसके बारे मे पूरी ईमानदारी से कितना जानते है? यह प्रश्न अपने आप से अकेले मे ज़रूर पूछिए,सही जवाब ढूंढे और बड़ा मन करके उसे स्वीकार करे|

2. अपनी आदत /व्यवहार/ ज़रूरत के मुताबिक अपनी जीवनसाथी को चुने,उसकी किसी एक योग्यता से प्रभावित होकर अपना पूरा जीवन उसके लिए बर्बाद नहीं करे|

3. आर्थिक रूप से सक्षम बने बिना परिवारवालों से बगावत करके किसी अनजान के साथ घर बसाने का सपना देखना, गलत फैसला हो सकता है और इस गलती को सुधारने का कोई दूसरा मौका नहीं होता, अतः बहुत सोच समझकर फैसला ले|

4. पसंद और ज़रूरते समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहती है| किसी एक पसंद को अपनी ज़िद बनाकर अपने पूरे जीवन को नर्क ना बनाये| एक बात का विशेष ध्यान रखे कि सच मे सबकी ख़ुशी मे ही अपनी ख़ुशी होती है, सिर्फ अपनी ख़ुशी के लिए दूसरो को दुःख देना कितना सही है यह फैसला मै आपके ऊपर छोड़ता हूँ |

5. अंत मे एक महत्वपूर्ण बात – हम कितने भी अमीर हो जाये, बड़े नामवाले बन जाये, बड़ा पद पा ले लेकिन उसकी ख़ुशी मनाने के लिए कोई अपना/ परिवारवाले/ समाज के लोग साथ ना हो तो बहुत खटकता है| आज भले ही इस बात से सहमत ना हो लेकिन सच मे अपने,अपने होते है|

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