‘वॉल – ई’ फिल्म में बताया गया है कि किस तरह धरती एक डस्टबिन बन कर रह गई है और इस कचरे को सही जगह पर रखने के लिए धरती पर एक रोबोट मौजूद है, जिसका नाम वॉल-ई है. फिल्म बताती है कि इंसान डस्टबिन बन चुकी धरती से तकनीक की मदद से दूसरे ग्रह पर शिफ्ट हो गए हैं. लेकिन इसी तकनीक ने उन्हें इस कदर सुस्त और मोटा बना दिया है कि वो अपनी मर्जी से उठ भी नहीं सकते हैं. उनके पीछे एक स्ट्रेचरनुमा गाड़ी फिट है जिस पर वो हमेशा बैठे या लेटे रहते हैं. किसी भी चीज़ की ज़रूरत के लिए उन्हें बस बटन दबाना होता है और वो चीज़ उनके सामने आ जाती है. यहां तक की अगर कही गलती से उन्होंने करवट ले ली या किसी वजह से वो पलट गए तो तुरंत वहां दूसरी गाड़ी आ जाती है जो उन्हें सीधा कर देती है.

फिल्म का एक दृश्य है, जिसमें कचरा घर बन चुकी धरती पर मौजूद इकलौता रोबोट (वॉल ई) जब भी कहीं से गुज़रता है तो स्क्रीन पर एक विज्ञापन चलने लग जाता है. इस कमर्शियल में एक जोश भरी आवाज़ बताती है कि किस तरह ‘आप अपनी जिंदगी के पांच साल एक शानदार क्रूज़ पर बिता सकते हैं, वो भी एकदम स्टाइल में. जहां पूरी तरह ऑटोमैटिक क्रू आपकी हर चीज़ का ख्याल रखेगी और आपको एक कदम भी चलना नहीं पड़ेगा. बस क्रूज़ की ऑटोमैटिक हॉवरचेयर में बैठिए और बटन दबाते ही आपका सारा काम हो जाएगा…यहां तक की आपकी दादी-नानी भी इस क्रूज़ का मज़ा ले सकती हैं.’

जब लॉकडाउन (Lockdown) हुआ और कोरोना (Corona) के डर के मारे पूरी दुनिया को घर में बैठ जाना पड़ा. उसके बाद एक दौर चल पड़ा. खाना बनाने का दौर, लोग रोज़ नए नए तरीकों के पकवान बना कर सोशल मीडिया (Social Media) पर डालने लगे. एक दूसरे को चैलेंज देने लगे. पूरी-छोले से लेकर रसगुल्ला, गुलाबजामुन और समोसे तक वो तमाम चीज़े बनाई जाने लगी जो बता रही थी हम दरअसल अपनी दादी-नानी के साथ एक क्रूज पर सवार हैं. और इस कोरोना दौर का मज़ा ले रहे हैं. इसके साथ ही घरों में से एक बात और निकल कर आई, जिस किसी को भी सुबह उठना पडता था भले ही मजबूरी में ही, और जिसकी सुबह उठने की आदत थी, दोनों ही की सुबह देर से होने लगी. रात में जागने का सिलसिला, फिल्म देखने का दौर और वो तमाम बातें हुई या हो रही हैं जिसने हमारे रूटीन का मटियामेट कर दिया.

मेहनत करना नहीं छोड़ेंगे…लॉकडाउन में जहां कई लोग घरों में कैद होकर अपना रूटीन बर्बाद कर रहे हैं वहीं कुछ खबरें ऐसी भी थी जो इसके बिल्कुल विपरीत थी और ये उस वर्ग से थी जो शायद कोरोना से लड़ने में सबसे ज्यादा सक्षम होगा क्योंकि वो मेहनतकश है. लॉकडाउन की वजह से कुछ मजदूर राजस्थान के सीकर में फंस कर रह गए थे. इन सभी को नेशनल हाइवे के एक कस्बे में मौजूद सरकारी स्कूल में ठहराया गया.

यहां रह रहे मज़दूरों के लिए यहां पर भोजन की और आराम की व्यवस्था थी, कुल मिलाकर उन्हें बस रोज़ सुबह उठना और खाना खाना, आराम करना था. लेकिन यहीं पर वो बात आती है जिसकी हम सभी को समझने की ज़रूरत है. मज़दूरों ने अपनी मेहनत करने की आदत को नहीं त्यागा, उन्होंनें सरपंच से रंग-रोगन का सामान मांगा और सभी मज़दूरों ने मिलकर पूरे स्कूल को रंगाई पुताई करके उसे चमका दिया.

ये खबर बताती हैं कि हम अगर चाहें तो अपने रूटीन को , अपनी जिंदगी को अनुशासित और सक्रिय रखना चाहें तो उसके लिए कोई दीवार आड़े नहीं आ सकती है और जो दीवार आड़े आती है उसे भी हम अपनी मेहनत से चमका सकते हैं. इस धरती पर रहने वाला हर जीव जो प्रकृति के साथ तालमेल बना कर चलता है, अगर आप उसकी दिनचर्या को देखोगे तो पाओगे कि उसका हर काम तय है. वो खाना भी तभी खाता है जब उसे भूख लगती है. वो मौसम के साथ अपने व्यवस्था करता है. वो लगातार मेहनत करता है.

एक मेहनत औऱ दूसरी बुनियादी चीज़ों की समझ

‘चाइना-‘हिडन ट्रेजर’ नाम की डॉक्यूमेंट्री बताती है कि ऐसे इलाके और जंगल जहां रहने वाले जानवर जो दुनिया की नज़रों से छिपे हुए हैं, जहां मौसम भी हर पल बदलता रहता है, कहीं कहीं पर महीनों बर्फ जमी रहती है. वहां रहने वाले तेंदुए से लेकर लोमड़ी और खरगोश से लेकर अन्य पक्षी अपने और अपने परिवार के लिए भोजन जुटाने के लिए लगातार शारीरिक मेहनत करते रहते हैं. कई बार तो मांए अपने बच्चे को छोड़कर कई –कई दिनों तक खाने की तलाश में रहती है. शेरनी अपने बच्चे को शिकार करना और शिकार होने से बचना सिखाती है. दरअसल हर जीव को जिंदा रहने के लिए दो बातों की बेहद ज़रूरत होती है. एक मेहनत औऱ दूसरी बुनियादी चीज़ों की समझ.

बुनियादी चीज यानि वो चीजे जिसके बगैर जीना मुश्किल है. हमारे घर परिवारों और लॉकडाउन में घरों में सामान से भरी हुई अलमारी से कच्चा माल निकाल कर रोज़ कुछ नया बनाकर सोशल मीडिया पर डालने वाले तबके को ये समझना भी ज़रूरी था कि संतुलित कैसे रहा जा सकता है. दरअसल यही वो वक्त था या शायद है जिसमें हम खुद को और बेहतर और लयबद्ध और सधा हुआ इंसान बना सकते हैं. ऐसा इंसान जो प्रकृति के साथ तालमेल बैठा कर चलना जानता है. जो अनुशासन मानता है, जो ये समझता है कि मेहनत ही है जो हमें बचा कर रख सकती है.

प्रकृति ने हमें ये मौका क्यों दिया था?

यह बात नकारात्मक होने के लिए नहीं कही जा रही है बल्कि ये समझने के लिए की जा रही है कि प्रकृति ने हमें ये मौका क्यों दिया था ? और उसका हमने क्या अर्थ निकाला. यह बात इसलिए भी नहीं है कि अच्छा या स्वादिष्ट खाना नहीं खाया जाए, बल्कि ये दौर ये समझने का था कि हमें सध कर किस तरह रहना चाहिए.

गांधी जी ने भी अपनी जिंदगी में इसी अनुशासन और मेहनत को तरजीह दी. गांधी जी के जीवन में सादगी और अनुशासन हमेंशा रहा. यहां तक कि अपने जीवन के अंतिम दिन भी वो हमेशा की तरह ही सुबह उठे, रोज़ाना की तरह नितकर्मों से निपटे और रोज़मर्रा की तरह ही जीवन की शुरूआत की. यहां तक कि जिस चीन को इस महामारी के लिए दोषी माना जा रहा है वहीं पर रहने वाली 57 साल की वू पेई के बारे में गांधीवादी चिंतक डॉ.ब्रह्मदीप बताते हैं कि वो गांधीजी को अपना आदर्श मानती हैं और उनकी तरह ही जीवन जीती हैं. यानि शाकाहारी भोजन करती है, सादगी से रहती है औऱ खूब पैदल चलती हैं. कुल मिलाकर हमें हमारे जीवन में मेहनतकश और सादा जीवन अपनाने की बेहद ज़रूरत है. तभी हम इस महामारी से निजात पा सकते हैं. इसके लिए ये समझना होगा कि हम कम से कम में कैसे रह सकते हैं. या यूं कहें कि हमें अपनी सही आवश्यकताओं का निर्धारण करना बेहद ज़रूरी है ये महामारी बताती है कि हमें अपने अंदर मौजूद मजदूर की फितरत को जगाना होगा.

मजदूर के दम पर टिकी हुई है दुनिया

मजदूर यानि वो जिसकी दम पर दुनिया टिकी है. मजदूर वो केवल वो नहीं है जो हमारी कहानी, कविताओं, लेखो, भाषणों का किरदार होता है. मजदूर केवल वो भी नहीं है जो भाषणों में हिस्सेदार होता है . हर मेहनत करने वाला, जो जिंदगी को संवारने के लिए, उसे तराशने के लिए मेहनत करता है. वो मजदूर है. घर में सुबह से शाम तक खटने वाली मां भी मजदूर है और घर से निकल कर घर के लिए रोटी की जुगाड़ करने वाला शख्स भी मजदूर है. वो जो धरती के साथ मिलकर खेत बनाता है औऱ अन्न उगाता है वो भी मजदूर है . वो जो उसे पीस कर दो वक्त की रोटी बनाता है वो भी मजदूर है . कलाकार भी मजदूर है, रचनाकार भी मजदूर है. जिंदगी को उभारने वाला लेखक भी मजदूर है और जिंदगी को संवारने वाला कवि भी मजदूर है. जब ये मजदूर रामधारी सिंह दिनकर बनकर कागज पर उतरता है तो कहता है –

मैं मजदूर हूं मुझे देवों की बस्ती से क्या /अगणित बार धरा पर मैंने स्वर्ग बनाए
अम्बर पर जितने तारे उतने वर्षों से / मेरे पुरखों ने धरती का रूप सवार

 

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