संजय कुंदन की कविताएं (Sanjay Kundan Poem): संजय कुंदन हिंदी के जानेमाने कहानीकार और पत्रकार हैं. उनकी कविताओं और कहानियों में समाज के हर वर्ग की एक झलक और द्वन्द देखने को मिलता है. संजय कुंदन को उनकी कविता के लिए 1998 के भारत भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. आज हम आपके लिए कविताकोश के साभार से लेकर हाजिर हुए हैं संजय कुंदन की कुछ कविताएं….

1. वो जो तानाशाह की पालकी उठाए
सबसे आगे चल रहा है
मेरे दूर के रिश्ते का भाई हैऔर जो पीछे-पीछे आ रहा है
मेरा निकटतम पड़ोसी है

वो वक्त-बेवक्त आया है मेरे काम
और जो आरती की थाल लिए चल रहा है
वह मेरा दोस्त है
जिसने हमेशा की है मेरी मदद
और जो कर रहा प्रशस्ति पाठ
वह मेरा सहकर्मी है मेरा शुभचिंतक

मैं उस तानाशाह से घृणा करता रहा
लानतें भेजता रहा उसके लिए
पर एक शब्द नहीं कह पाया
अपने इन लोगों के खिलाफ
ये इतने भले लगते थे कि
कभी संदिग्ध नहीं लगे
वे सुख-दुख में इस तरह साथ थे कि
कभी खतरनाक नहीं लगे
हम अपने लोगों के लालच को भांप नहीं पाते
उनके मन के झाड़-झंखाड़ की थाह नहीं ले पाते
उनके भीतर फन काढ़े बैठे क्रूरता की
फुफकार नहीं सुन पाते
इस तरह टल जाती है छोटी-छोटी लड़ाइयां
और जिसे हम बड़ी लड़ाई समझ रहे होते हैं
असल में वह एक आभासी युद्ध होता है
हमें लगता जरूर है कि हम लड़ रहे हैं
पर अक्सर बिना लड़े ही जंगल जीत लेता है हमारा दुश्मन .

Also Read: तड़प उठा मेरा मुंसिफ़ भी फ़ैसला दे कर, पढ़ें अदीम हाशमी की शायरी

2. उसकी माँ उसे जीवन भर नादान देखना चाहती थी
पर शहर ने उसे समझदार बना दिया

सबसे पहले उसने अपनी हँसी की लहरों को बाँधा
उसकी हँसी ही उसकी दुश्मन बन सकती थी
यह उसने जान लिया था
उसने सीख लिया कि कहाँ कितना वज़न रखना है अपनी हँसी का
थोड़ी भी अतिरिक्त हँसी उसे गिरा सकती थी किसी गहरी खाई में

वह पहचानने लगी थी भाषा के भीतर की खाइयों को
यहाँ सहानुभूति का अर्थ कारोबार भी था
और दोस्ती का अर्थ आखेट हो सकता था
इसलिए वह सबसे ज्यादा सावधान रहती थी
मोरपंख जैसे शब्दों से
गुलदस्ते जैसे शब्दों से
उसे पता चल गया था कि
विनम्रता कितना ख़तरनाक फन्दा बुन सकती थी

वह बहुरुपियों को उन्हीं के हथियार से
चुनौती दे सकती थी पर उसे उन हथियारों से कोई लगाव न था
उसे किसी को हराने और जीतने का शौक न था
वह तो किसी तरह बच-बचाकर निकल जाना चाहती थी
अपने सपने की ओर .
3. क्या कर सकता है अधिक से अधिक
एक नाराज आदमी
बहुत करेगा तो ओढ़ लेगा चुप्पी की चादर
या बन जाएगा पत्थर
दिखेगा एक बेडौल मूर्ति की तरह

हालाँकि लाख कुरेदो वह नहीं बता पाएगा
कि वह किससे नाराज है
बहुत तंग करने पर कह देगा कि
वह खुद से नाराज है
पर यह सही जवाब नहीं होगा
यही तो समस्या है कि
उसे कई चीजों का सही जवाब नहीं मिल पाता
वह हर चीज को उसकी सही जगह पर देखना चाहता है
खुद को भी
लेकिन सही जगह मिलना कहाँ है आसान

अपनी नाराजगी के सूत्र खोजते हुए
अक्सर और उलझ जाता है नाराज आदमी
फिर वह खुद को मनाना शुरू कर देता है
चेहरे पर पानी के छींटें मारता है
और मुस्कराने जैसा मुँह बनाता है

वह तेज कदमों से लौटता है
गौर से देखने पर पता चलता है कि
उसकी एक मुट्ठी बँधी हुई है

उसमें उसने बचा कर रख लिया होता है
अपना थोड़ा गुस्सा.





Source link