आजकल एक नया ट्रेंड है, कि किसी भी अपराध के लिए दलितों या आदिवासियों का नाम सामने लाया जाता है, जिससे बड़ी साज़िश को छुपाया जा सके. सवाल ये है कि क्या पालघर में भी आदिवासियों को दोषी बताकर असली गुनहगारों को बचाया जा रहा है. भारत के आदिवासी सरल और सहज स्वभाव के होते हैं. ऐसे में आदिवासियों द्वारा इस तरह का हिंसक व्यवहार एक बड़ी साज़िश की तरफ इशारा करता है.

पालघर लोकसभा क्षेत्र में छह विधानसभा सीटें हैं, इन छह सीटों में एक-एक सीट पर शिवसेना और NCP के विधायक हैं. तीन सीटों पर बहुजन विकास अघाड़ी नाम की पार्टी के विधायक हैं. और एक सीट डहाणु में CPM के विधायक हैं. बहुजन विकास अघाड़ी और CPM, दोनों वैचारिक रूप से करीब हैं. दोनों वामपंथी विचारधारा को बढ़ावा देते हैं और ये माना जाता है कि ये विचारधारा साधु-संतों और भगवाधारियों के प्रति नफरत का जहर भरती है. इसलिए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि पालघर की घटना साधु-संतों और भगवाधारियों के प्रति हेट क्राइम है. इस हत्या के राजनैतिक वजह होने के आरोप इसलिए भी लग रहे हैं क्योंकि पालघर की घटना के वीडियो में कुछ स्थानीय नेता भी नज़र आए.

इसमें काशीनाथ चौधरी नाम के एक स्थानीय नेता का नाम लिया जा रहा है. काशीनाथ चौधरी पालघर में NCP का ज़िला पंचायत सदस्य है. जो उस जगह पर दिख रहा है, जहां पर भीड़ ने साधुओं को पीट-पीट कर मार डाला था. स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के मुताबिक घटना के वक्त काशीनाथ चौधरी के अलावा CPM के तीन ज़िला पंचायत सदस्य विष्णु पातरा, सुभाष भावर, धर्मा भावर भी मौजूद थे. हमने जब इन स्थानीय नेताओं के बारे में पुलिस से सवाल पूछे तो जवाब ये मिला कि पुलिस खुद काशीनाथ चौधरी को घटना स्थल पर लेकर गई थी जिससे भीड़ को नियंत्रण में करने में मदद ली जा सके. हालांकि हमने वीडियो को ध्यान से देखा तो ये स्पष्ट नहीं हो पाया कि ये नेता लोगों को समझाने के लिए घटनास्थल पर पहुंचा था. वीडियो से ऐसा ही लग रहा है कि ये व्यक्ति भी भीड़ का हिस्सा था. 

किसी को अफवाह की वजह से चोर समझ कर पीट देना, ये बात तो समझ में भी आती है, लेकिन जान से मार देने के पीछे मकसद क्या था?…और वो भी पुलिस के सामने पीट पीट कर हत्या करना. इस सवाल का जवाब यही है कि ये लोग इलाके में अपने नाम की दहशत बनाना चाहते थे. दहशत से ही ज़िला और गांव स्तर की राजनीति चलती है. महाराष्ट्र में अगले साल ग्राम पंचायत चुनाव होने वाले हैं. राजनीति का वामपंथी मॉडल इसी दहशत पर काम करता है, ये आप सभी ने पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बहुत देखा है. 

स्थानीय नेताओं द्वारा सबको डरा धमका कर रखने की बात पुलिस पर भी लागू होती है. इसीलिए पुलिस ने भी भीड़ के सामने सरेंडर कर दिया. पालघर में करीब साढ़े नौ बजे साधुओं पर भीड़ का हमला हुआ था. सूचना दिए जाने के करीब एक घंटे बाद घटना स्थल पर करीब 15 पुलिसकर्मी पहुंचे. पुलिसवालों के पास हथियार भी थे. लेकिन किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि वो हवाई फायरिंग ही कर देता और भीड़ को कंट्रोल करने की कोशिश करता. उल्टे पुलिसवालों ने ही हाथ पकड़कर घायल साधुओं को भीड़ के हवाले कर दिया, कि वो उसे जी भर कर पीट लें. जिस देश मे सिर्फ पुलिसवाले को देखकर ही लोग घबराते हैं, उस देश में कैसे ये हो गया कि पुलिसवालों के सामने ही किसी की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई? हमने कई एक्सपर्ट से बात की और ये पूछा कि क्या पुलिस उस भीड़ को कंट्रोल नहीं कर सकती थी, जिस भीड़ ने पालघर में साधुओं की हत्या की थी?
 
अब सोचिए कि अगर पालघर में जिनकी हत्या की गई, वो किसी दूसरे संप्रदाय के होते तो एक खास सोच वाले लोग अब तक सोशल मीडिया पर मातम मना रहे होते. डिजाइनर पत्रकार और फिल्म अभिनेता सोशल मीडिया पर ज्ञान दे रहे होते. मोमबत्ती गैंग और अवॉर्ड वापसी गैंग के सदस्य एक्टिव हो जाते. प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से जवाब मांगे जाते. कई लोग प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांग चुके होते. लोकतंत्र और संविधान को खतरे में बताया जाता. विदेशी अखबारों में लेख छपवाए जाते. ये कहा जाता कि भारत कितना असहनशील देश है. लेकिन 16 अप्रैल की इस घटना के 4 दिन बाद भी सेक्युलर गैंग सन्नाटे में है. ये खामोश इसलिए हैं क्योंकि इन्हें पालघर वाली मॉब लिचिंग में एक धर्म विशेष वाला एंगल नहीं मिल रहा. इसका मतलब यही निकलता है कि ये लोग मॉब लिचिंग को भी मजहब के चश्मे से देखते हैं. ऐसे लोगों को ना इंसानों से मतलब है, ना इंसानियत से मतलब है, इनको सिर्फ धर्म से मतलब है, जिसका इनके एजेंडे वाली दुकान चलती रहे.





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