• इस स्थिति के दूसरे नतीजे भी होंगे, सरकारों के खिलाफ जनता का गुस्सा  सामने आएगा
  • चीन ने हांगकांग में आजादी के प्रमुख कानून को ताक पर रखा

दैनिक भास्कर

Apr 25, 2020, 12:38 AM IST

इस समय पूरी दुनिया का ध्यान नए कोरोना वायरस की तरफ है। इसलिए लगभग सभी देशों में सत्तारूढ़ नेताओं ने सोच लिया है कि यह मनमानी करने का अनुकूल समय है। कई राजनेता कोविड-19 महामारी से फायदा उठाकर अपने अधिकार बढ़ा रहे हैं। चीन ने इस मौके पर दक्षिण चीन सागर के विवादग्रस्त द्वीपों के आसपास अपनी पकड़ मजबूत बनाई है। उसने हांगकांग में स्वायत्तता के कानून को ताक पर रख दिया है। 84 देशों में इमरजेंसी कानून लागू कर कार्यपालिका को अधिक अधिकार दिए गए हैं। कुछ मामलों में तो ये अधिकार महामारी से लड़ने के लिए जरूरी हैं। लेकिन कई मामलों में तो इनकी जरूरत नहीं है।

चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग ने 17 अप्रैल को हांगकांग के मामलों में चीन सरकार के दखल पर रोक लगाने वाले बुनियादी कानून को मानने से इनकार कर दिया है। जाहिर है, उसकी योजना हांगकांग की आजादी पर नियंत्रण का अभियान छेड़ने की है। कुछ सरकारें बलि के बकरों की तलाश करती हैं। भारत में सत्ताधारी पार्टी ने मुसलमानों को कोविड-19 संक्रमण फैलाने वाला बताकर हिंदुओं का समर्थन हासिल करने की कोशिश की है। मुसलमानों के एक धार्मिक कार्यक्रम में एक हजार लोग संक्रमित पाए गए। इसका प्रचार करने में सरकार ने कोई कसर बाकी नहीं रखी है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने कई दिन तक कार्यक्रम के मामलों की अलग से संख्या दी। हंगरी में प्रधानमंत्री विक्टर ओरबन तानाशाह बन गए हैं।

हर जगह लोग डरे हुए हैं। स्वेच्छाचारी नेता जनता के स्वास्थ्य की रक्षा के नाम पर जबर्दस्ती करने वाले औजार हड़प रहे हैं। तानाशाह नेता खुश हैं कि उन्हें अपने खिलाफ जनता के विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने का अच्छा बहाना मिल गया है। पिछले वर्ष ऐसा जनविरोध भारत, रूस और अफ्रीका, लेटिन अमेरिका के बड़े हिस्से में देखा गया है। महामारी ने चुनाव स्थगित करने का कारण दे दिया है। बोलिविया में ऐसा ही हुआ है। अजरबैजान के राष्ट्रपति विपक्ष को अलग-थलग करने के लिए लॉकडाउन कानूनों के उपयोग की धमकी देते हैं। वायरस से लड़ने के लिए संक्रमित लोगों पर नजर रखने और उन्हें क्वारंटाइन करने की जरूरत पड़ती है। इसका अर्थ प्राइवेसी में अधिक दखल है। 

थाइलैंड के तानाशाह प्रधानमंत्री प्रयुथ चान ओछा का कहना है, इस समय स्वतंत्रता से अधिक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य है। आजादी को सीमित करने के लिए उठाए गए कई कदम जन स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं हैं। सेंसरशिप से जानकारी रूकती है और वायरस से संबंधित सबूत नहीं मिल पाते हैं। सोशल डिस्टेंसिंग के पक्षपातपूर्ण नियम से सरकार में लोगों का विश्वास घटता है। इसका नतीजा क्या होगा? कोविड-19 महामारी लोगों को गरीब बनाएगी, बीमार करेगी और गुस्सा बढ़ाएगी। कुछ नेता महामारी से फायदा उठा रहे हैं लेकिन जनता की तकलीफों से निपटने में होने वाली विफलता उनके खिलाफ जाएगी। उनकी सत्ता के अखंड और अजेय होने की धारण गलत साबित होगी। जिन देशों में लोग भूखे हैं, पुलिस लाठी-डंडा चलाकर लॉकडाउन लागू कर रही है और सत्ताधीशों के मित्र, समर्थक बेजा फायदा उठा रहे हैं, वहां कुछ शासकों के हाथ से सत्ता निकल सकती है। 



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