पत्नी ही क्यों, शादी के बाद पति भी बदले अपना सरनेम
-जापान में महिलाएं इन दिनों अपनी पहचान के लिए एकजुट हो रही हैं

शादी से पहले लड़कियों को अपने पिता का और शादी के बाद अपने पति के सरनेम को अपनी पहचान बनाना पड़ता है। इस तरह महिलाओं के लिए शादी के बाद अपनी पहचान को खोना पड़ता है। महिलाओं का मानना है कि शादी के बाद अपना नाम बदलने के लिए मजबूर किया जाना मानव अधिकारों का उल्लंघन है। यह मुद्दा यूं तो सालों से बहस का विषय है लेकिन इन दिनों जापान में यह महिला आंदोलन का रूप ले चुका है। यहां महिलाएं एक ऐसे कानून को बदलने के लिए संघर्ष कर रही हैं जो महिलाओं को अपना सरनेम या खुद का चुना हुआ नाम रखने से प्रतिबंधित करता है।

एक अनुमान के अनुसार जापान में हर साल लगभग 6 लाख जोड़े शादी करते हैं। कानून के अनुसार शादी के बाद दंपती का सरनेम एक ही होना चाहिए। तकनीकी रूप से पुरुषों अपनी पत्नी का सरनेम उपयोग कर सकते है।

हालांकि व्यवहारिक रूप से केवल 4 फीसदी पुरुष ही ऐसा करते हैं। लेकिन शाादी के बाद महिलाओं को अपना सरनेम लगाने की इजाजत नहीं है। जुलाई में हुए उच्च् सदन के चुनाव प्रचार के दौरान सर्वाजनिक बहस के दौरान यह मुद्दा भी छाया रहा। प्रधानमंत्री शिंजो आबे के खिलाफ विपक्षी दलों ने लैंगिक समानता को खूब भुनाया। वहीं प्रधानमंत्री आबे अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने बहस के दौरान इस कानून में बदलाव के समर्थन में हाथ नहीं उठाया था। उनकी रूढ़ीवादी पार्टी का तर्क है कि वर्तमान कानून पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान है, और यह परंपरा का विषय है। आबे का कहना है कि अगर हम परंपराओं को महत्वपूर्ण मानते हैं तो फिर कानून को बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है।

121 साल पुराना कानून
जापान में यह 1898 में इस कानून के पास होने तक जापानी लोग आमतौर पर उपनाम का उपयोग नहीं करते थे। इसलिए इसे प्राचीन परंपरा नहीं कहा जा सकता। 1948 से सभी शादी-शुदा जोड़ों के लिए पति या पत्नी का उपनाम चुनना कानूनन अनिवार्य कर दिया गया। लेकिन पति का नाम अपनाने की ही परंपरा सी चल पड़ी। वहीं विदेशियों के साथ शादी इस कानून के अधीन नहीं हैं। उपनाम जापान में लैंगिक असमानता के लिए भी काफी हद तक जिम्मेदार है। विसित देशों में लैंगिक अंतर (जेंडर पे गैप) के आधार पर वेतन देने के मामले में तीसरे स्थान पर है। इतना ही नहीं देश में राजनीति और बिजनेस में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व नाममात्र का है। देश में प्रबंधकीय पदों पर केवल 4 फीसदी महिलाएं ही कार्यरत हैं। ऐसे ही निदेशक या अध्यक्ष के पद पर बमुश्किल 2 फीसदी महिलाएं हैं। ऐसे ही अन्य वरिष्ठ पदों पर 10 फीसदी महिला कर्मी काम करती हैं।

पिछले साल जारी एक सरकारी सर्वेक्षण में 42.5 फीसदी वयस्कों ने इस कानून में बदलाव का समर्थन किया था। यह बीते पांच साल की तुलना में 7 फीसदी ज्यादा था। वहीं 29.3 फीसदी लोगों ने बदलाव का विरोध भी किया। इधर संयुक्त राष्ट्र ने भी उपनाम में बदलाव के लिए जापान पर दबाव बनाया है। अलग-अलग सरनेम वाले जोड़े टैक्स में छूट का लाभ नहीं उठा सकते, कानूनी तौर से उनमें से केवल एक के पास ही बच्चे की कस्टडी रहने की अनुमति है। इतना ही नहीं अलग-अलग सरनेम के कारण लोगों को यह समझाना किसी मुसीबत से कम नहीं कि वे वास्तव में पति-पत्नी हैं। लिविंग रिलेशशिप या अलग-अलग सरनेम होना जापानी समाज में असामान्य बात है। प्रधानमंत्री आबे ने यह समाधान निकाला है कि कंपनियां अपने कर्मचारियों को उनके जन्म के नाम का औपचारिक रूप से उपयोग करने दें। वहीं इस साल नवंबर से लोगों को कुछ निश्चित सरकारी पहचान पत्रों पर अंतिम नामों को सूचीबद्ध करने का काम भी किया जाएगा। जिससे वे बैंक खाते खोल सकते हैं या अपनी पसंद के उपनाम के साथ ऋण निकाल सकते हैं। हालांकि यह इतना भी सहज नहीं है।

 

और भी रहे हैं विवाद
जापान में सिर्फ महिलाओं की पहचान को लेकर ही मुद्दा गर्माया हुआ नहीं है। नवंबर 2017 में जापानी संसद में बच्चे को लेकर पहुंची राजनीतिज्ञ यूका ओगाटा को भी ऐसा करने पर विरोध का सामना करना पड़ा था। संसद में मौजूद अन्य लोगों ने उन्हें तुरंत वहां से अपने 7 महीने के बच्चे के साथ बाहर जाने का कहा। इस बात ने उस समय काफी तूल पकड़ा। इस घटना ने जापान में एक और महिला प्रधान समस्या की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित करवाया था कि जापान में कामकाजी माओं के सामने अपने बच्चों की परवरिश को लेकर किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट के अनुसार अपनी शुरुआती जिंदगी में 71.3 फीसदी जापानी महिलाएं किसी न किसी नौकरी में होती हैं। ऐसे में काम के दौरान बच्चों की देखभाल की सुविधा न देना, काम के तय समय में महिलाओं की जरुरतों के हिसाब से लचीलापन न होना और पंरपराओं का निर्वहन चुनौती बन जाती है।













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